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हंस परिचय

               

मुंशी प्रेमचंद ने साहित्यिक पत्रिका हंस की स्थापना सन 1930 में बनारस में की थी. शुरू के दो वर्षों में महात्मा गाँधी और कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी भी इसके सम्पादक मण्डल में शामिल रहे. प्रेमचंद मृत्युपर्यंत (8 अक्तूबर 1936) मासिक रूप में इसे नियमित निकालते रहे. उनकी मृत्यु के बाद प्रसिद्ध कथाकार जैनेन्द्र कुमार और प्रेमचंद की पत्नी शिवरानी देवी संयुक्त रूप से इसके सम्पादक रहे. हंस के विशेषांकों में स्वयं प्रेमचंद द्वारा वर्ष 1933 में संपादित ‘काशी अंक’ के अलावा ‘प्रेमचंद स्मृति अंक’, ‘एकांकी नाटक अंक’, ‘रेखाचित्र अंक’, ‘कहानी अंक’, ‘प्रगति अंक’ तथा ‘शान्ति अंक’ विशेष रूप से उल्लेखनीय रहे. जैनेन्द्र और शिवरानी देवी के बाद इसके सम्पादक शिवदान सिंह चौहान और श्रीपत राय और उसके बाद अमृत राय और तत्पश्चात् नरोत्तम नागर रहे. मुंशी प्रेमचंद की मृत्यु के बाद हंस कुछेक साल निकलने के पश्चात बंद हो गई. कुछ अंतराल के बाद फिर शुरू हुई, लेकिन फिर कुछ वर्ष चलकर इसे बंद हो जाना पड़ा. बहुत दिनों बाद सन् 1959 में हंस का एक वृहत् संकलन सामने आया जिसमें बालकृष्ण राव और अमृत राय के संयुक्त सम्पादन में आधुनिक साहित्य एवं उससे सम्बन्धित नवीन मूल्यों पर विचार किया गया था.


प्रेमचंद की मृत्यु की अर्धशती पर 1986 में हंस को पुनः शुरू किया गया. इस बार इसके संपादन और प्रकाशन का दायित्व कथाकार-उपन्यासकार राजेन्द्र यादव ने सँभाला, जिसे वे 27 साल से ज्यादा समय तक अबाध रूप से निबाहते रहे. 28 अक्टूबर 2013 को अपनी मृत्यु तक राजेन्द्र यादव ने हंस के 325 अंकों का संपादन किया. इस दौरान साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में हंस एक ‘परिघटना’ की तरह स्थापित हुई. राजेन्द्र यादव ने इसे कथा-पत्रिका के कलेवर से आगे बहुत सी बहसों का केंद्र भी बनाया. ये बहसें समाज के वंचित तबकों के संबंध में थीं जिनके जरिए अल्पसंख्यकों, दलितों और स्त्रियों के हक के सवाल को वे हिंदू समाज की बनावट के बुनियादी बिंदुओं तक ले गए. अपने इन्हीं रेडिकल तेवरों के कारण हंस कई बार उग्रपंथियों के निशाने पर भी आई और बहुत से लोगों को राजेन्द्र यादव ‘विवादप्रिय’ संपादक भी लगे. इस दौरान हंस के कई विशेषांक काफी लोकप्रिय हुए. अतिथि संपादकों द्वारा निकाले गए ‘औरत उत्तरकथा अंक’, ‘मुसलमान अंक’, ‘इलेक्ट्रानिक मीडिया अंक’, ‘सिनेमा अंक’ आदि काफी लोकप्रिय हुए. राजेन्द्र यादव की मृत्यु के तत्काल बाद उनपर केंद्रित एक स्मृति-अंक भी निकाला गया. फिलहाल कथाकार संजय सहाय हंस के संपादक हैं
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